
डी.डी. हॉस्पिटल पर स्वास्थ्य विभाग का शिकंजा: गंभीर लापरवाही उजागर, नोटिस जारी
गौरेला पेंड्रा मरवाही – पेंड्रारोड। डी.डी. हॉस्पिटल सेमरा तिराहा की कार्यप्रणाली पर अब स्वास्थ्य विभाग ने सख्त रुख अपना लिया है। जिला प्रशासन के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम द्वारा किए गए निरीक्षण में अस्पताल में गंभीर अनियमितताएं और नियमों की खुली अनदेखी सामने आई है। जांच रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने अस्पताल प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए तीन दिनों के भीतर जवाब तलब किया है।

जांच में सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि मृतक मरीज ज्योति सोनवानी एक्लेम्सिया जैसी अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित थी, जिसका उपचार मेडिकल कॉलेज स्तर की संस्था में ही संभव था। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने मरीज को भर्ती कर उपचार शुरू किया, जिसे स्वास्थ्य विभाग ने नियमों के विपरीत और मरीज की जान से खिलवाड़ माना है। निरीक्षण के दौरान यह भी पाया गया कि 17 और 18 जून को अस्पताल में भर्ती मरीजों की देखरेख के लिए कोई चिकित्सक मौजूद नहीं था। नर्सिंग होम एक्ट 2010 एवं 2013 के अनुसार अस्पताल में 24 घंटे डॉक्टर और दक्ष स्टाफ की उपलब्धता अनिवार्य है, लेकिन जांच में यह व्यवस्था पूरी तरह नदारद मिली।
हैरानी की बात यह रही कि वार्ड में सर्जरी के बाद कई मरीज भर्ती थे, लेकिन उनकी निगरानी के लिए कोई ऑन-ड्यूटी डॉक्टर मौजूद नहीं था। स्वास्थ्य विभाग ने इसे अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही, अकर्मण्यता और संवेदनहीनता बताया है।

जांच टीम को यह भी पता चला कि अस्पताल में शल्य कार्यों के लिए आवश्यक स्त्री रोग विशेषज्ञ, सर्जन, एनेस्थेटिस्ट और अन्य प्रशिक्षित स्टाफ की स्थायी व्यवस्था नहीं है। साथ ही भर्ती मरीजों की निगरानी के लिए 24×7 आवासीय चिकित्सा अधिकारी भी उपलब्ध नहीं पाया गया, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।
मामले में आर्थिक अनियमितता का आरोप भी सामने आया है। शिकायत के अनुसार आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज होने के बावजूद मरीज पक्ष से लगभग 1.50 लाख रुपये अतिरिक्त वसूले गए, जिसे स्वास्थ्य विभाग ने योजना की भावना के विपरीत और गंभीर अनियमितता माना है।

CMHO द्वारा जारी नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि अस्पताल द्वारा आवश्यक डॉक्टरों और स्टाफ की व्यवस्था नहीं करना छत्तीसगढ़ राज्य उपचर्यागृह तथा रोगोपचार संबंधी स्थापना अनुज्ञापन अधिनियम 2010 की धाराओं 7, 8 एवं 18(2)(ग) का उल्लंघन है। अस्पताल प्रबंधन को तीन दिवस के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर अस्पताल के खिलाफ कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है।
इस कार्रवाई के बाद जिले में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं और स्वास्थ्य विभाग की आगामी कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।















